Thursday, June 13, 2019

电邮积压不利健康 BBC教你缓解工作压力

安德鲁·克斯比的邮箱里有7千封电邮。在某些人看来,这不算多。但他到现在的软件公司任职才刚刚一年,所以电子邮箱还没塞到失控的程度。

安德鲁是软件公司Relax Gaming的高管,与分布在全欧洲的八个办公室联系,他平均每天大约发送140封电邮。

他说:“你必须有选择性地接收发送邮件,选择那些跟你有关的,因为人家抄送到你邮箱的邮件太多了,很多跟你一毛钱关系也没有。”

这就是电子邮件的问题所在。那封全年度对你最重要的唯一一封邮件,很可能被埋没在堆积如山的邮件中,你根本就没看见。

电邮堆在邮箱里成千上万,不仅关系到工作效率问题,还对身体健康有害。

曼彻斯特大学研究机构心理问题的加利·库珀(Cary Cooper)教授说:“邮箱里邮件太多,会让人生病。”

他说:“问题是没有很好的指引告诉人们怎样才是使用电邮的最好办法,哪些是我们使用电邮时不应该做的事情。”

“我们抄送给所有人,而不是那一两个我们真正需要去沟通的人。部门经理如果不是万不得已,绝不能在下班时间给下属发电邮。”

“在星期五晚上给别人发邮件,还告诉对方可以等到周一才处理,这么做根本没有意义,因为人们收到之后会担心,十之八九会在周末就把事情做了。”

不过,库珀教授并没有说电邮应该完全彻底杜绝使用。

针对使用电邮所带来的问题,法国已经采取行动加以解决。2017年,法国立法要求各家公司拿出行动计划确保员工有“不在线”的权利,在下班之后不必受工作邮件的干扰。

2018年8月,英国公司Rentokil Initial 的法国分公司被裁定违反了这一法规,必须赔偿一名员工6万欧元。

虽然英国并没有类似的法律条规,但是有些公司已经开始采取行动。

为慈善组织负责筹募资金的市场推广公司Platypus Digital自2014年成立以来,就禁止员工在内部沟通时使用电子邮件。任何人发电邮给公司同事,将给慈善机构捐5镑钱作为警示。

该公司经理迈特·柯林斯(Matt Collins)说,“我们都在慈善机构或商业公司里工作过较长时间,都体会过内部电邮泛滥的问题,这一问题的结果就是我们一天绝大部分的时间都被毫无必要地浪费在向同事通报最新情况。”

这家有7名员工的公司利用短信服务和谷歌的文件共享软件等其他办公软件服务彼此沟通。

柯林斯说,用这些工具,更加有效也更好玩。

但是,如果你在一家大机构工作怎么办呢?你不用电邮办不成事情怎么办。

纽约一家律师事务所的经理克莱尔·高德森半年前决定尝试“收件邮箱随时清空”的办法,从那时起她一直大力宣传这么做的好处。这种办法就是严格管理你的邮箱,最理想的状态是不让收件箱里留下任何未处理的邮件。

网上其实有很多如何处理电子邮件的各种建议,这些建议综合起来不外乎一个要诀:对你收到的每封邮件都必须有所行动。

克莱尔·高德森说:“我现在对电邮的办法是完全革命化的。我再也不必担心邮箱里还有邮件没有处理,或者忘了处理。”

“这样的工作方式很有满足感,我觉得效率更高,精神上也更加轻松了。”

不过高德森承认,对很多人来说,这么做有很多障碍。

“很多人觉得你根本做不到,他们觉得你一定是不停地查邮箱,删除或者分类。实际情况并不是这样。”

还有人认为她肯定是工作不够忙碌才可以这样。对此她也不同意。她说:“你越忙,越需要有条理。”

无论怎样,对绝大多数人来说,每天把邮件全部处理分类清空根本就做不到。

职场好帮手
美国一家公司Slack认为,谁要是能解决电邮积压问题,“就会成为世界上最重要的软件公司”,而这家公司提供的服务之一,就是让员工互通信息,协作项目。

据称,目前已经有60万家机构使用Slack公司的服务。Slack的创办人,就是对电子邮件伤透脑筋后才推出这项服务的。

在Slack服务中,员工按群互通信息,而不是按个人信箱。虽然这家公司在三年中损失了4.2亿美元,但现在已经计划公司上市了。

本文最开始提到的那位安德鲁,就使用Slack,也很喜欢它的服务,尽管这样,他的电邮信箱中仍然攒下了7千个封邮件。

包括微软在内的其他公司也在努力解决电邮问题,现在微软被Slack视为最大的竞争对手。微软在2017年推出了“微软团队”(Microsoft Teams)目前据称有50万家公司在使用。

而脸书(Facebook)也有一个团队互通信息的群聊工具叫职场(Workplace)。

秘诀?
虽然很多人谈起这些办公室里的群聊工具都眉飞色舞,但是这些工具似乎并不能完全替代电子邮件。电邮仍然是与外部联系的最好方式。

柯林斯先生说,用电邮的秘诀就是使用时严格把关。他在所有发出去的文件中都附了一个说明,解释自己用电邮的守则,提醒联系人他的邮件将尽量简短,除非对方是现在的客户,否则不要期待他很快回复。

他说很多人都喜欢这份守则,而且好像很有效果。等我再问他时,他的邮箱里只剩下20几封邮件没有处理。

当然,上面推荐的这些做法如果还是太费力了,那么你可能就只能考虑破罐子破摔这一招了。

这个办法就是让邮件都堆在那里,对它们视而不见,就像债多不愁一样,你反而彻底解脱了自己的内疚和焦虑。

Friday, May 24, 2019

美国华盛顿州引领潮流 遗体堆肥 死后化春泥

美国华盛顿州本周(5月21日)通过一项法律,允许在人去世后,将其遗体转化成泥土花肥(composting),成为“堆肥葬”。

华盛顿州也将成为美国“堆肥葬”合法化的第一个州,为人们提供一种全新的丧葬选择,真正做到“化做春泥”,滋润大地。

如何运作?
来自华盛顿州的斯佩德(Katrina Spade)和她创立的人类遗体堆肥“重组”(Recompose)公司,之前曾是这一运动背后的主要推手。

该公司将可能成为提供这种服务的首个公司。他们表示,可以在1个月内把尸体转化为可用的肥料,为花草树木提供营养。

具体过程是,将遗体放在装有苜蓿,木屑和稻草的六角形钢制容器中。

美国得克萨斯州立大学的法医人类学家韦斯科特(Daniel Wescott)说,如果把尸体放在露天环境下,大约需要几个月的时间才能最终分解,化为泥土。

但还要取决于天气情况。如果在干燥气候中,尸体可以变成木乃伊并且可以保持多年。但如果气候湿润,只要几个星期就会变成一堆尸骨。

韦斯科特解释说,只要能有大量嗜热细菌活动,尸体便可以在一个月内彻底分解。

根据华盛顿州立大学的教授卡彭特-伯格斯(Prof Lynne Carpenter-Boggs)率领的研究小组研究显示,在人体分解的最后阶段通过加入混合木屑和类似的营养材料,能让微生物和细菌更好地发挥作用。

而且,在人体分解过程中需要加温到摄氏55度,这样可以起到消毒杀菌的作用,分解后的土壤就可以安全使用了。

来自美国西雅图市的居民尼娜就持这种观点。她表示,对她来说最重要的是当她死后,自己的遗体还能为曾经生养过她的大地“做点贡献”。

但目前,火葬和土葬仍然是人们处理遗体的主要方法。但随着墓地越来越稀有和昂贵,也有人选择干脆把骨灰撒入江河湖海。

主张"堆肥葬"的人士称,这种方式不但更绿色环保,还能节省自然资源

“重组”公司称,用遗体堆肥只使用火化八分之一的能源,并且比传统方法排放的二氧化碳量要少得多。

西雅图非盈利性丧葬服务组织的执行董事曼金(Nora Menkin)表示,这可以带来真正的变化,因为华盛顿州是美国火化率最高的州。

瑞典和英国
其实,这种堆肥葬在瑞典已经合法。

与此同时,英国法律也允许不使用棺材的自然埋葬,或是使用可生物降解棺材的埋葬方法。

“重组”公司的斯佩德希望,未来能把城市的一些旧存储仓库变成未来墓地的陈列室,陈列室中存放由人类遗体所转化成的泥土肥料,供死者亲属前来吊唁和认领。

当然,像任何新生事物刚出现时一样,都会有人对此感到难以接受,特别是涉及到人的生死后事问题。

正像19世纪末的火葬一样,用遗体堆肥这种方式很有可能会受到宗教机构和现有殡葬业的阻碍。

随着观念的逐渐开放,人们开始接受火葬。火葬流行的另外一个原因是因为其费用低。

美国南加州大学公共政策教授斯隆恩(Prof David Sloane)表示,人们对围绕死亡、纪念以及追悼等习俗也在不断发生转变。

“这一变化体现在方方面面,比如更多人选择在家离世,而不是在医院。有些人宁愿在社交媒体表达自己的哀思,而不是去教堂,”斯隆恩说。

西雅图非盈利性丧葬服务组织的执行董事曼金则表示,对许多人来说这还取决于葬礼的开销。

火葬目前仍是最便宜的丧葬选择,大约为1100美元,土葬平均价格是7000美元或更高。

把遗体转化成土壤肥料的方法目前预计大约为5500美元,价格不菲。

但或许随着堆肥葬的普及和费用的降低,这种新型的丧葬形式也能推而广之?

Friday, May 10, 2019

शत्रुघ्न और रविशंकर के गोद लिए गांव किस हाल में

बिहार के पटना साहिब लोकसभा क्षेत्र के लिए बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद और कांग्रेस नेता शत्रुघ्न सिन्हा के बीच मुख्य मुक़ाबला है.

प्रधानमंत्री सांसद आदर्श ग्राम योजना जिसकी शुरुआत मोदी सरकार ने अक्तूबर 2014 में की थी, उसके तहत इन दोनों ही सांसदों ने पटना साहिब लोकसभा क्षेत्र के गांवों को गोद लिया था.

लेकिन इन गांवों की तस्वीर कितनी बदली है, ये वहां जाकर पता चला.

"यहां सैनिटरी पैड यूनिट, एलईडी विनिर्माण केन्द्र, पेपर प्लेट मेकिंग यूनिट, डिजिटल सेवा केन्द्र और रूरल बीपीओ खुला है, उससे अलावलपुर गांव के 20 लोगों को रोज़गार मिला है. जिसमें 18 महिलाएं और 2 पुरुष हैं. इसके अलावा एनआईईएल आईटी का कंप्यूटर साक्षरता केन्द्र भी है जहां छात्र कंप्यूटर सीखते हैं."

लेकिन इन सब केन्द्रों की ज़मीनी तस्वीर बहुत उत्साहित करने वाली नहीं है. हम जब वहां पहुंचे सैनिटरी पैड, पेपर प्लेट मेकिंग, एलईडी विनिर्माण केन्द्र में सन्नाटा पसरा था तो रूरल बीपीओ बिजली की आवाजाही झेल रहा था.

हालांकि रूरल बीपीओ में काम कर रही चांदनी और अलका ने बीबीसी से बातचीत में अपनी ख़ुशी ज़ाहिर की.

सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक कॉल सेंटर एक्जीक्यूटिव के तौर पर काम करने इन लड़कियों को 3,500 रुपये मासिक मिलते हैं.

वो कहती हैं, "हम पढ़ते भी हैं और कमाते भी. हमारा काम प्रधानमंत्री ग्रामीण डिजिटल साक्षरता अभियान के लाभ पाए लोगों का वैरिफ़िकेशन करना है."

अलावलपुर बिहार की राजधानी पटना के फतुहा प्रखंड स्थित गांव है. इसको केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना के तहत गोद लिया है.

गांव तक पहुंचने के दो रास्ते हैं. पटना से सटे गौरीचक से अलावलपुर का रास्ता जिसकी सड़क अच्छी स्थिति में है. दूसरा रास्ता फतुहा से भिखुआ मोड़ से अलावलपुर तक का है. ये दूसरा रास्ता हमें 'पुराने' बिहार की याद दिलाता है 'जहां सड़क में गढ्ढे नहीं हुआ करते थे बल्कि गढ्ढों में सड़क' थी.

अलावलपुर पंचायत के मुखिया उपासना सिंह के पति राकेश कुमार सिंह कहते है, "मंत्री जी (रविशंकर प्रसाद) ने यहां 40 से 50 लाख रुपये ख़र्च किए हैं. पूरे गांव में सोलर लाइट लगवाई और सड़क जो जर्जर अवस्था में थी उसे ठीक कराया."

हालांकि गांव घूमने पर सड़क बहुत अच्छी स्थिति में नहीं दिखती. जहां तक सोलर लाइट का मामला है तो दक्षिण पट्टी जहां दलित आबादी की रिहाइश है वहां सोलर लाइट नहीं लगी है.

यहां रहने वाले उमाकांत रविदास कहते हैं, "पूरे गांव में लाइट लगी है लेकिन दक्षिण पट्टी में एक भी लाइट नहीं लगी. मंत्री जी गांव भी आते हैं तो कभी इस पट्टी में नहीं आते."

Tuesday, April 23, 2019

लोकसभा चुनाव से पहले वोटर लिस्ट में चेक करें अपना नाम, ये है तरीका

नई दिल्ली. चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है और 11 अप्रैल से वोटिंग प्रक्रिया शुरू भी हो गई है। अगर आप 18 साल या 18 साल से ऊपर की आयु के हैं तो आप मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। लेकिन क्या आपने वोटर लिस्ट में अपना नाम चेक किया है। नहीं...तो आप आसानी से कर सकते हैं। राष्ट्रीय मतदाता सेवा की ऑफिशियल वेबसाइट पर लॉग इन करके और कुछ आसान स्टेप्स को फॉलो करने के बाद आप अपना नाम आसानी से वोटर लिस्ट में देख सकते हैं। आपका वोट आपका हक है और इस एक वोट का इस्तेमाल कर आप आने वाले 5 सालों के लिए बेहतरीन सरकार चुन सकते हैं। ऐसे में ज़रूरी है कि वोटिंग से पहले अपना नाम वोटिंग लिस्ट में ज़रूर देख लें। ताकि ये हक आपसे छिन न जाएं। आप नीचे दिए कुछ स्टेप्स फॉलो कर अपना नाम वोटर लिस्ट में चेक कर सकते हैं।

कैसे करें वोट, गूगल डूडल से जानें, डूडल बनाकर मतदाताओं को किया गया है जागरूक

इन स्टेप्स से करें चेक
1.वोटर लिस्ट में अपना नाम चेक करने के लिए सबसे पहले चुनाव आयोग के नेशनल वोटर सर्विस पोर्टल https://www.nvsp.in/ पर लॉग इन करना होगा। यहां आप दो तरीकों के ज़रिए अपना नाम चेक कर सकेंगे। आप यहां मैन्युअली अपनी सभी जानकारी डालकर या फिर EPIC नंबर डालकर अपना नाम आसानी से चेक कर सकते हैं। EPIC नंबर आपको वोटर आईडी कार्ड पर मिल जाएगा।

2.EPIC नंबर है तो आपको NVSP इलेक्ट्रोल पेज पर लॉग इन करने के बाद यहां अपना EPIC नंबर डालना होगा। राज्य का चयन करने और कैपचा में नजर आ रहे कोड को भरने के बाद सर्च के ऑप्शन को चुनें। आपका नाम वोटर लिस्ट में होगा तो आपको नज़र आ जाएगा। लेकिन अगर सर्च करने के बाद आपका नाम नहीं आता है तो इसका मतलब ये होगा कि आपका नाम वोटर लिस्ट में है ही नहीं।

3. वहीं एक तरीका मैन्यूअली भी है जिसमें अगर आपके पास EPIC नंबर नहीं है, तो आपको NVSP पर लॉग इन करने के बाद मांगी गई सभी जानकारी भरनी होगी। जब आप सर्च के ऑप्शन को क्लिक करेंगे तो आपका नाम अगर वोटर लिस्ट में होगा तो आ जाएगा।

नाम न होने पर कहां करें शिकायत
वही अगर आप 18 साल से ऊपर हैं, आपके पास वोटर आईडी कार्ड भी है और इसके बावजूद भी आपका नाम वोटर लिस्ट में नहीं है तो आप अपने निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव संबंधी अधिकारी से संपर्क करें और शिकायत दर्ज कराएं।

वोटर लिस्ट में नाम होना है ज़रूरी

वोटर लिस्ट में नाम होने पर ही आप वोट दे सकेंगे लिहाज़ा ज़रूरी है कि आपका नाम वोटर लिस्ट में ज़रूर हो। अपना नाम ऊपर दी गई प्रक्रिया के ज़रिए आसानी से चेक किया जा सकता है।

गुजरात : भाजपा 19 सीटों पर सुरक्षित, असल चुनाव 7 सीटों पर

गुजरात में आज चुनाव है। नेताओं को जो कहना था, बताना था, समझाना था, वह सब कर चुके। आज जनता बताएगी कि उसने किसे-कितना सुना और किस पर उसे यकीन हुआ। तमाम सर्वे, दावों के बावजूद भाजपा गुजरात को लेकर परेशान नहीं है। गुजरात में भाजपा की मजबूती का अंदाजा 2014 के नतीजों से लगा सकते हैं। तब सूरत, वडोदरा और नवसारी सीटें उसने पांच लाख के अंतर से जीती थीं। जबकि गांधीनगर सीट पर जीत का अंतर चार लाख रहा था। दो सीटों पर जीत का मार्जिन तीन लाख और 10 सीटों पर अंतर दो लाख  से ज्यादा वोटों का था। वहीं सात सीटें ऐसी भी थीं जहां करीब एक लाख वोटों का अंतर था। देखा जाए तो भाजपा 19 सीटों पर सुरक्षित दिखती है। असल चुनाव तो इन सात सीटों पर होना है, जहां बहुत ही मामूली अंतर से जीत-हार का फैसला होगा।

दूसरी ओर 2017 के विधानसभा चुनाव से तुलना करें तो 26 में से 7 सीटें ऐसी थीं जहां कांग्रेस को  भाजपा से 14 हजार से लेकर 1.68 लाख वोट ज्यादा मिले। ये सीटें थीं बनासकांठा, पाटण, मेहसाणा, साबरकांठा, सुरेंद्रनगर, जूनागढ़ और अमरेली। कांग्रेस अपने लिए सबसे ज्यादा मौके भी इन्हीं सीटों पर देख रही थी। इस बात का भाजपा को भी अंदाजा था। भाजपा को पता था कि मोदी ही वो फैक्टर हैं जो हर एंटी इन्कमबेंसी और बगावत को शांत कर सकते हैं।

यही वजह है कि मोदी ने गुजरात में जो 7 रैलियां की, उनमें से 4 रैलियां इन्हीं सीटों पर हुई हैं। नतीजा-जो माहौल इन सीटों पर कुछ दिनों पहले एकतरफा दिख रहा था, वहां भाजपा ने न सिर्फ वापसी की है, बल्कि वह बढ़त भी बनाती दिखने लगी है। भाजपा गुजरात में मोदी वर्सेस गुजरात विरोधी, देश विरोधी का फैक्टर साबित करने में सफल रही। वहीं राहुल गांधी गुजरात को लेकर अनमने से नजर आए। 2014 में राहुल और सोनिया ने मोदी लहर के बावजूद गुजरात में 11 रैलियां की, इस बार सिर्फ राहुल आए और 5 रैलियां कर गए। प्रचार का पूरा जिम्मा हार्दिक पटेल, अहमद पटेल और स्थानीय नेताओं पर छोड़ दिया। इतना ही नहीं, प्रियंका गांधी को भी गुजरात से दूर रखा गया।

शहरों में वोटिंग ज्यादा तो भाजपा को फायदा, गांवों में कांग्रेस को : गुजरात में मौसम विभाग ने वोटिंग के दिन हिट वेव की आशंका जताई है। भाजपा और कांग्रेस दोनों की कोशिश है कि शुरुआती 4 घंटों में ज्यादा वोटिंग हो। भाजपा शहरों में ज्यादा और गांवों में कम वोटिंग में फायदा देख रही है। इसके उलट कांग्रेस की कोशिश गांवों में ज्यादा वोटिंग की है। गुजरात में 43% वोटर शहरों में, 57% वोटर गांवों में हैं। 2014 में 60% वोटिंग हुई थी। हालांकि वो एक लहर थी। लेकिन 2009 में 47.9% वोटिंग हुई थी। इनमें गांवों की भूमिका बड़ी थी। भाजपा को 15, कांग्रेस को 11 सीटें मिली थीं।

आखिरी दिन का माहौल|उत्तर-दक्षिण और मध्य में भाजपा की वापसी, कांग्रेस सौराष्ट्र के सहारे

मध्य गुजरात (9 सीटें)

भाजपा सिर्फ आणंद में नर्वस है। अहमदाबाद की पूर्व-पश्चिम सीटों पर जीत का अंतर घट सकता है। गांधीनगर में अंतर बढ़ सकता है। हार्दिक को चांटा लोगों को प्रायोजित लग रहा है। भरुच में त्रिकोणीय लड़ाई का फायदा भाजपा को है। कांग्रेस से मुस्लिम उम्मीदवार होने से ध्रुवीकरण होगा।
दक्षिण गुजरात (5 सीटें)

सूरत, नवसारी, वलसाड में भाजपा मजबूत है। सूरत में दर्शना जरदोश के खिलाफ नाराजगी है, लेकिन मोदी से फायदा है। वलसाड में कांग्रेस ने जोर लगा रखा है, ये वोटों में कितना तब्दील होता है ये नतीजे आने पर पता चलेगा। जीएसटी, नोटबंदी का मुद्दा गायब है। राष्ट्रवाद की चर्चा है।
उत्तर गुजरात (5 सीटें)

भाजपा पाटण में कमजोर है। लेकिन मोदी की रैली असर दिखा सकती है। अल्पेश के इस्तीफे ने कांग्रेस को कमजोर कर दिया है। मेहसाणा, साबरकांठा, बनासकांठा में मार्जिन का गेम है। सीटें किसी भी तरफ झुक सकती हैं। बनासकांठा में डेयरी वालों का फरमान भाजपा पर असर डालेगा।
सौराष्ट्र-कच्छ (7 सीटें)

अमरेली से कांग्रेस प्रत्याशी परेश धानाणी की पटेल स्टेच्यू पर टिप्पणी को मोदी ने मुद्दा बनाया है। इसका असर हो सकता है। राजकोट, जामनगर, कच्छ और भावनगर सीट भाजपा निकालेगी। पोरबंदर में कांटे की टक्कर है। जूनागढ़ का हाल भी अमरेली जैसा है। यहां मामूली अंतर से फैसला होगा।

ओवरऑल : 26 सीटों पर नजर डालें तो भाजपा 22 या 23 सीटों पर जीत सकती  है। जबकि कांग्रेस 3 या 4 सीटों पर। इनमें अधिकांश का फैसला बहुत मामूली अंतर से होने वाला है। बहरहाल, वोटरों के दिल में क्या है, ये तो नतीजे ही बताएंगे।

Wednesday, April 10, 2019

बीबीसी के नाम पर वायरल चुनाव सर्वेक्षण - क्या है सच?

बीते कुछ दिनों से ट्विटर से लेकर फेसबुक और वॉट्सऐप पर कई समूहों में एक फ़ेक न्यूज़ वायरल हो रही है.

इस फ़ेक न्यूज़ में दावा किया गया है कि बीबीसी, सीआईए और आईएसआई के सर्वे के मुताबिक़ लोकसभा चुनाव 2019 में बीजेपी की जीत मिलने जा रही है.

लेकिन ये पहला मौका नहीं है जब बीबीसी के नाम पर इस तरह की फ़ेक न्यूज़ वायरल हो रही हो.

इससे पहले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान भी ऐसी झूठी ख़बरें प्रसारित हो चुकी है.

लेकिन बीबीसी हर मौके पर स्पष्ट करता आया है कि वह चुनावों को लेकर किसी तरह का सर्वे नहीं करता है और इस बार भी कोई सर्वे नहीं किया गया है.

ख़ास बात ये है कि इस ट्वीट को प्रामाणिकता देने के लिए ट्वीट में बीबीसी न्यूज़ की वेबसाइट के होम पेज का लिंक भी लगाया गया है.

इसके अलावा ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने इस ट्वीट को शेयर किया है.

संयोग की बात है कि ऐसे कई लोगों के नामों के आगे चौकीदार लिखा हुआ पाया गया.

हर साल की तरह बीबीसी ने इस बार भी सोशल मीडिया पर स्पष्ट किया है कि बीबीसी इस तरह के सर्वे नहीं करता है.

बीबीसी हिंदी के संपादक मुकेश शर्मा ने भी फेसबुक पर लिखा है, "अक्सर चुनाव के समय देखा जाता है कि लोग ये दुष्प्रचार करते हैं कि बीबीसी ने 'चुनाव सर्वेक्षण' किया है और फलां पार्टी जीत रही है. एक बार फिर ऐसा दुष्प्रचार हो रहा है. इसमें बताया जा रहा है कि लोकसभा चुनाव-2019 को लेकर बीबीसी ने एक सर्वे किया है जबकि बीबीसी ने ऐसा कोई सर्वे नहीं किया. बीबीसी ये स्पष्ट करना चाहता है कि न तो बीबीसी चुनावी सर्वेक्षण कराता है और न ही किसी एक पक्ष की ओर से किए गए 'इलेक्शन सर्वे' को प्रकाशित ही करता है. इससे पहले भी बीबीसी ने उसके नाम पर होने वाले चुनावी सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता का खंडन किया है."

"इसके बावजूद कुछ लोग बीबीसी की विश्वसनीयता का फ़ायदा उठाने की फ़िराक़ में रहते हैं. ऐसे मामले पहले भी देखे गए हैं जब राज्य विधानसभा चुनाव के दौरान बीबीसी के नाम पर ऐसे चुनावी सर्वेक्षण चलाए गए मगर हक़ीक़त ये है कि बीबीसी ने ऐसा कोई सर्वेक्षण नहीं किया है."

इससे पहले हरियाणा विधानसभा चुनाव और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान भी ऐसी झूठी ख़बरें वायरल हो चुकी हैं.

Tuesday, April 2, 2019

解放军战机飞越台湾海峡“中线”,中美台三方角力再掀波澜

两架中国解放军战斗机于3月31日飞越台湾海峡“中线”,引起台湾政府强烈抗议,批评中国挑衅,动摇台海和平。中国官媒《环球时报》则以社论回应此次越过“中线”乃严正警吿台独势力,并直接表示,台湾与美国近日的频繁军事互动,中国需给予美台警告。中美台三方的角力关系,以军事交锋,再次掀起波澜。

据台湾国防部日前记者会表示,3月31日台湾海峡上空,有两架中国“歼11战斗机”于当日上午11点飞越台湾海峡中线。台湾空军立刻派出在空中侦巡的IDF“经国号”战机前往拦截,四架F16战机也立即升空。双方对峙10分钟后,中国战斗机返回。

解放军战机飞越台海“中线”
台湾总统蔡英文隔日发文批评中国挑衅,并呼吁北京当局“不要挑衅、不要制造事端、不要破坏台海现状”。

中国官媒《环球时报》社论表示,“中线”只是条“心理线”,维持此“中线”之前提是“两岸关系的政治基础保持不变,台湾也不发生与外部势力超过以往水平的联系和互动。”

美国在台协会(AIT)发言人孟雨荷(Amanda Mansour)在接受台湾官媒《中央社》访问时表示:“北京应该停止强制胁迫手段,恢复与台湾民选政府对话。”

《环球时报》社论强调:“从美国通过《台湾旅行法》以来,美台互动不断以切香肠的方式加码。大陆方面不可能不作出反应,华盛顿太高估了其军事力量对大陆方面的威慑力。”

《环球时报》批评美国军舰今年三次通过台湾海峡之外,还有台湾在印太入群之后,与美国正在交易的军售,都是此次中方越过中线中国回击的严肃警告。

美国对台军售案成熟
蔡英文上周刚结束的台湾太平洋邦交国行程,在旅程尾声于美国领土夏威夷过境,并同时与华府重点智库“传统基金会”(The Heritage Foundation),发表视讯演说。蔡英文证实,台湾政府已向美国提出购买F-16B战斗机以及坦克车之要求,并表示此军购将“大大增强台湾的陆空作战能力,加强军事士气,并向全世界展示美国对台湾防御的承诺。”

此次军购若获美国国会通过,将是1992年美方出售150架F16A、B型战机之后,美国再次出售F16战机给台湾。据军事专家表示,在台湾东部花莲以及西部嘉义基地执勤的F16战机20年来,“链接”美台国防军事合作,在军事及像征意义上有独特地位。

台湾现有主要空中战斗机种,除了F16A、B型战机之外,还有向法国购买的幻象2000(Mirage 2000)美国技术支援台湾生产的“经国号”(F-CK-1)。但法国出售之幻象2000,给台湾仅有对空作战,没有对地作战功能。1997年交机之后,就因为中方压力下,不再卖给台湾,“经国号”也在技术升级中。

然而F16特別受到瞩目,并不只是其能执行多重任务战术,可装备空对空飞弹或炸弹之外,也可以执行地面支援任务。

蔡英文政府向美国提出的66架“F16V”型新型战机,亦是当今世界许多亚洲国家在军事上都十分倚重之新型机种,包含日本、韩国、新加坡以及巴基斯坦都向美购买F16。

亚洲军事研究学者,华府智库“2049研究所”(Project 2049 Institute)研究员纪思安(Ian Easton)接受BBC中文访问解释,F16对台湾是个好战略武器,主要是其可以对于中国近年来军机多次围绕台湾周围领空的挑衅以及窒息性的压迫性战略,有喝止作用。

军事专家,《全球防卫杂志》采访主任陈国铭也告诉BBC中文,F16对台湾的重要性,立基于其功能不在长驱直入敌方内陆,而是先以守为攻的展略,有效将中共战机驱除出台湾海峡。