Wednesday, February 27, 2019

आओमोरी शहर में 21 फीट तक बर्फबारी, बर्फ हटाने का खर्च 248 करोड़ रुपए

टोक्यो. जापान का आओमोरी शहर दुनिया के सबसे ज्यादा बर्फीले स्थानों में से एक है। हाल ही में यहां 21 फीट बर्फबारी हुई। इतनी बर्फ दो मंजिला इमारत को ढांकने के लिए काफी है। पिछले साल बर्फ हटाने के लिए सरकार को 35 मिलियन डॉलर (करीब 248 करोड़ रुपए) खर्च करने पड़े। इस शहर में 30 हजार लोग रहते हैं।

सी-इफेक्ट स्नो
हर साल आओमोरी में बर्फीले तूफान आते हैं। नवंबर से शहर में हड्डी कंपा देने वाली साइबेरियाई हवाएं चलने लगती हैं। जैसे ही ठंडी हवा जापान के पहाड़ी तट से गर्म पानी को पार करती है, यह नमी इकट्ठा करती है और बर्फ में बदल जाती है। इसे सामान्य भाषा में सी इफेक्ट स्नो कहा जाता है। नवंबर में ही शहर में 8 फीट तक बर्फबारी हो जाती है।

सी इफेक्ट स्नो के चलते ठंड में आओरी और उसके आसपास के इलाको में बर्फ की मोटी परत जम जाती है। बर्फ की यह मोटी चादर अप्रैल तक होती है। घरों की छतें, सड़कें, शहर के निचले इलाकों में बर्फ ही बर्फ दिखाई देती है।

आओमोरी के बाहरी इलाके में रहने वाली जूलिया मिनातोया कहती हैं कि यहां रहने वाले हर व्यक्ति को हर दिन संघर्ष करना पड़ता है। हालांकि आओरी ठंड के दिनों में यहां परिवहन बंद नहीं होता। इसके चलते बर्फ देखने के लिए यहां भारी तादाद में पर्यटक आते रहते हैं।

एक सी फूड विक्रेता योने नात्सुमे कहते हैं कि आओरी में मछली खासकर कॉडफिश मिलने का सबसे अच्छा सीजन ठंड ही है। लोग यहां आकर मौज करते हैं। अमेरिका से यहां घूमने आए टिम रॉबर्ट्स कहते हैं कि यह जगह दुनिया से अलग इसलिए है क्योंकि यहां पहाड़ों में ज्यादा मोड़ नहीं है।

आओमोरी तक पहुंचना भी मुश्किल नहीं है। टोक्यो से हाईस्पीड ट्रेन से यहां महज तीन घंटे में पहुंचा जा सकता है। यहां का एयरपोर्ट पहाड़ पर बसे एक कस्बे में है। ठंड में ट्रेन से आना ही बेहतर है, क्योंकि बर्फबारी के चलते अक्सर फ्लाइट कैंसिल हो जाती हैं। यहां से बर्फ हटाने के लिए 120 सदस्यीय टीम लगातार काम में जुटी रहती है।

जब आपको फिल्म ऑफर हुई तो आपने क्या सोच कर उसके लिए हामी भरी?
स्नेहा : मेरे पिता किसान हैं। गांव में उनकी वजह से मैं जानी जाती हूं। मेरा सपना है कि लोग मेरी वजह से मेरे पिता को जानें, इसलिए मैं पुलिस में जाना चाहती हूं। बस उसी सपने की वजह से मैंने फिल्म की। कभी नहीं सोचा था कि यह छोटी-सी फिल्म इतना बड़ा अवार्ड जीत लेगी।

अब क्या सपना है, फिल्म लाइन में ही करियर बनाना है या कुछ और करना है?
स्नेहा : मेरा सपना दिल्ली पुलिस में भर्ती होना है। यह सपना मैंने बचपन से देखा है। 2018 में मैंने फिजिकल निकाल लिया था। लेकिन लिखित परीक्षा में कुछ नंबरों से पीछे रह गयी। मैं अभी भी उसकी तैयारी कर रही हूं। हालांकि, अभी कोई वैकेंसी नहीं आई है। यूपी पुलिस की परीक्षा दी है। अब देखें क्या रिजल्ट आता है?

अभी आप अमेरिका में हैं, कैसा अनुभव रहा आपका?
स्नेहा : मैं रेड कारपेट पर चली। मैंने जिंदगी में इतने कैमरे नहीं देखे, जितने यहां देखे हैं। जिस समय ऑस्कर अनाउंस हुआ, उस समय मैं एआर रहमान के साथ बैठी थी। मैं तब चीख पड़ी थी। रहमान साहब ने मेरा फोटो अपने मोबाइल में खींचा और मेरे साथ सेल्फी भी ली। जो लड़की हापुड़ से दिल्ली तक नहीं गई, उसके लिए यह गौरवान्वित करने वाला पल था।

Thursday, February 21, 2019

पाक‍िस्तानी सांसदों ने सऊदी प्रिंस को ग‍िफ्ट में दी सोने की बंदूक

पाक‍िस्तान भले ही कंगाली की कगार पर हो और पाक‍िस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान कारों के कारवां को बेच धन जमा करने को मजबूर हों लेक‍िन मेहमाननवाजी में वे पीछे नहीं रहते. पाक‍िस्तानी सांसद ने सऊदी अरब के शहजादे को गोल्ड-प्लेटेड गन ग‍िफ्ट में दी. प्रधानमंत्री इमरान खान के ही सामने उनके घर पर ये गन ग‍िफ्ट में दी गई.

दरअसल, सांसदों के एक डेल‍िगेशन ने सीनेट चेयरमैन साद‍िक संजरानी के नेतृत्व में सऊदी राजकुमार को प्रधानमंत्री आवास पर बुलाया था. उनका स्वागत बहुत जोरदार तरीके से हो और पाक‍िस्तान के साथ उनके र‍िश्ते अच्छे रहें, इसके ल‍िए उन्होंने कुछ अलग करने की सोची.

वहां पाकिस्तानी सांसद ने सऊदी अरब के राजकुमार मोहम्मद ब‍िन सलमान को सोने से मढ़ी हुई गोल्ड प्लेटेड MP-5 ग‍िफ्ट की ज‍िसकी दुन‍िया भर में चर्चा हो रही है . इसके साथ ही इन्होंने राजकुमार का एक पोर्टेट भी ग‍िफ्ट क‍िया. बंदूक के साथ सोने की ही ढेर सारी गोलि‍यां भी दी गईं.

बता दें क‍ि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्‍मद बिन सलमान रविवार को पाकिस्‍तान की राजधानी इस्‍लामाबाद पहुंचे थे. सऊदी सुल्तान के शहजादे को यह पहला पाकिस्‍तान दौरा था और आते ही उन्‍होंने इस्‍लामाबाद के साथ अपनी दोस्‍ती निभा दी थी. सऊदी के शहजादे ने पाक में 20 बिलियन डॉलर के निवेश का ऐलान क‍िया था. सऊदी के शहजादे मोहम्मद ब‍िन सुल्तान बुधवार से भारत दौरे पर हैं.

प्रधानमंत्री इमरान खान को भी म‍िली थी सोने की गन
गौरतलब है क‍ि 15 जनवरी को जब पाक‍िस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान सऊदी अरब के दौरे पर गए थे. वहां ताबुक प्रॉव‍िंस के गर्वनर प्र‍िंस फहाद ब‍िन सुल्तान ब‍िन अब्दुल अजीज ने उन्हें गोल्ड-प्लेटेड क्लाशन‍िकोव गन और सोने की गोल‍ियां ग‍िफ्ट में दी थीं.

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद 7 दिन तक चुप रहने के बाद कांग्रेस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जमकर हमला बोला है. कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि जब 14 फरवरी को दोपहर में पुलवामा में आतंकी हमले में हमारे 40 जवानों की शहादत हुई तो पूरा देश शोक मना रहा था. उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शाम तक कॉर्बेट पार्क में एक फिल्म की शूटिंग में व्यस्त थे. क्या दुनिया में ऐसा कोई पीएम है?

कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि पुलवामा में 3 बजकर 10 मिनट पर हमला हुआ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शाम 6.10 बजे तक शूटिंग कर रहे थे. जबकि देश हमारे शहीदों के टुकड़े चुन रहा था और पीएम मोदी अपने नाम के नारे लगवा रहे थे. आतंकी हमले में जवानों की शहादत के बाद देश के घरों में चूल्हे बंद थे और पीएम उत्तराखंड के रामनगर के गेस्ट हाउस में चाय नाश्ता कर रहे थे.

कांग्रेस ने कहा कि शायद ही दुनिया में किसी देश के प्रधानमंत्री ने ऐसा कभी किया हो. इस देश का प्रधानमंत्री पुलवामा हमले के बाद चार घंटे तक वन विहार करता रहे. देश शहीदों के टुकड़े चुन रहा था, तब पीएम नरेंद्र मोदी जलसे कर रहे थे. हमले के बाद 3 घंटे तक शूटिंग कर रहे थे. ऐसे प्रधानमंत्री को क्‍या कहा जाए, मेरे पास शब्द नहीं हैं.

सुरजेवाला ने कहा कि हमले के बाद भी प्रधानमंत्री नौका विहार करते रहे. उनकी सभाएं नहीं रुकीं. मंत्रियों ने शहीदों के ताबूत के साथ सेल्‍फी ली. देश अभी शोक में डूबा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सैर-सपाटे के लिए विदेश दौरे पर चले गए हैं. पालम एयरपोर्ट पर भी शहीदों के ताबूत पीएम नरेंद्र मोदी का इंतजार करते रहे, लेकिन वे वहां लेट पहुंचे.

कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि हम पुलवामा के कायराना हमले पर निर्णायक कार्रवाई की मांग करते हैं. इंदिरा गांधी ने न केवल बांग्लादेश को आजादी दिलवाई बल्कि नियाजी को 91000 पाक सैनिकों के साथ समर्पण करना पड़ा था. पाकिस्तान को इंदिरा गांधी ने धूल चटाने का काम किया था.

Monday, January 28, 2019

क्या है आरक्षण पर 13 प्वाइंट रोस्टर, जिसपर SC/ST एक्ट की तरह फंस गई है सरकार

देश के विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी वर्ग को आरक्षण देने के लिए नए नियम 13 प्वाइंट रोस्टर लागू करने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा सही ठहराए जाने को लेकर विरोध शुरू हो गया है. सर्वोच्च न्यायलय के इस फैसले को आरक्षण के सिद्धांत के खिलाफ बताते हुए केंद्र सरकार के सहयोगी दल समेत तमाम विपक्षी दल सरकार से इस फैसले को पलटने के लिए संविधान में संशोधन की मांग कर रहे हैं. 

केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए 200 प्वाइंट रोस्टर को खारिज कर 13 प्वाइंट रोस्टर लागू करने के इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा हस्तक्षेप से इनकार करने के फैसले से दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम कॉलेज में एडहॉक पर पढ़ा रहीं नीतिशा खलको निराश हैं. वह कहती हैं, ‘कितनी मुश्किलों में मैंने झारखंड से आकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिंदी विषय में पीएचडी की, और अब डीयू में एडहॉक पद पर पढ़ा रही हूं. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले से हमारी उम्मीद खत्म हो गई है.’ वह कहती हैं, ‘एक तो विश्वविद्यालयों में नौकरियों के लिए विज्ञापन नहीं निकलते हैं और अगर 13 प्वाइंट रोस्टर के हिसाब से विज्ञापन आएंगे भी, तो अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों की नियुक्ति संभव नहीं है. क्योंकि इस रोस्टर के दायरे में वे कभी आ ही नहीं पाएंगे.’

किस बात से डर रहे हैं ST/SC/OBC वर्ग के छात्र?

देश के विश्वविद्यालयो में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए 200 प्वाइंट रोस्टर के तहत आरक्षण की व्यवस्था थी. इस व्यवस्था के तहत विश्वविद्यालय को एक यूनिट माना जाता था. जिसके तहत 1 से 200 पद के लिए 49.5 फीसदी आरक्षित वर्ग और 50.5 फीसदी अनारक्षित वर्ग के हिसाब से भर्ती की व्यवस्था की गई थी. यूनिवर्सिटी को एक यूनिट मानने से सभी वर्ग के उम्मीदवारों की भागिदारी सुनिश्चित हो पाती थी. लेकिन नए नियम यानी 13 प्वाइंट रोस्टर के तहत विश्वविद्यालय को यूनिट मानने के बजाय विभाग को यूनिट माना गया. जिसके तहत पहला, दूसरा और तीसरा पद सामान्य वर्ग के लिए रखा गया है. जबकि चौथा पद ओबीसी कैटेगरी के लिए, पांचवां और छठां पद सामान्य वर्ग. इसके बाद 7वां पद अनुसूचित जाति के लिए, 8वां पद ओबीसी, फिर 9वां, 10वां, 11वां पद फिर सामान्य वर्ग के लिए. 12वां पद ओबीसी के लिए, 13वां फिर सामान्य के लिए और 14वां पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होगा.

नितिशा खलको कहती हैं कि 13 प्वाइंट रोस्टर के लागू होने की स्थिति में आदिवासी छात्रों के लिए कभी मौका ही नहीं मिल पाएगा. क्योंकि किसी भी विभाग में इतने पैमाने पर नौकरियों के लिए अधिसूचना जारी नहीं होती है. 14वें नंबर तक आते-आते अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण निष्क्रिय हो जाता है. इसे क्रमवार बताते हुए उन्होंने कहा कि विभाग को यूनिट मानने पर कभी भी एक साथ 14 पद आएंगे यह मुमकिन नहीं लगता है. उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति, जनजाति के लिए एक पद भी नहीं मिल पाएगा. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्लय जैसे तमाम विश्वविद्यालयों में कितने ऐसे विभाग हैं जिनमें मात्र एक या दो या अंतिम 3 प्रोफेसर ही विभाग को संचालित करते हैं. वहां पर कभी भी ST/SC/OBC की नियुक्ति नहीं हो पाएगी.

नीतिशा ने बताया कि अमूमन किसी भी विभाग में 1 या 2 या 3 पद निकलते हैं. इस स्थिति में सबसे पहले अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार की उम्मीद खत्म हो जाती है. उसके बाद अनुसूचि जाति और फिर उसके बाद अन्य पिछड़ा वर्ग की.

बहुजन साहित्य संघ की उपाध्यक्ष और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोध कर रहीं कनकलता यादव पूछती हैं कि विभाग को यूनिट मानने के बाद कितने साल बाद अनुसूचित जनजाति का नंबर आएगा?  फिर अनुसूचित जाति का नंबर आएगा, फिर ओबीसी का नंबर आएगा? इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है. 200 प्वाइंट रोस्टर से पहले 13 प्वाइंट रोस्टर था. इसी कारण OBC, SC, ST प्रोफेसरों की नियुक्ति नहीं हो पाती थी. उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सबसे पहले सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में 2015 में यही 13 प्वाइंट रोस्टर लागू किया था जिस कारण 84 असिस्टेंट प्रोफेसर में ST-SC का एक भी पद नहीं आया था. OBC का एक मात्र पद आया था.

200 प्वाइंट रोस्टर के पक्ष में दलील

दिल्ली विश्वविद्याल के श्याम लाल कॉलेज में इतिहास विभाग में पढ़ा रहे जितेंद्र कुमार मीणा कहते हैं कि 200 प्वाइंट रोस्टर और 13 प्वाइंट रोस्टर में ध्यान देने वाली बात यह है कि 13 प्वाइंट रोस्टर में 14 नंबर के बाद फिर 1,2,3,4 शुरू हो जाता है. जो 14 नंबर पर जाकर पुनः समाप्त हो जाता है. जबकि 200 प्वाइंट रोस्टर में 1 नंबर से पद शुरू होकर 200 नंबर तक जाता है. इस 200 नंबर के बाद फिर 1,2,3,4,5,6,7 से क्रम शुरू होता है और 200 नंबर तक जाता है. इस स्थिति में अनिवार्य रूप से ST, SC, OBC का पद क्रम आता है. मीणा ने कहा, ‘इस 200 प्वाइंट रोस्टर में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और किसी भी विश्वविद्यालय को अनिवार्य रूप से यूनिवर्सिटी को यूनिट मानना पड़ता है. इस स्थिति में ST, SC, OBC के साथ लोकतांत्रिक, सामाजिक और संवैधानिक न्याय होता है. हमें इसी 200 प्वाइंट रोस्टर के लिए तब तक लड़ना है जब तक इसे इस देश सभी विश्वविद्यालयों में लागू न कर दिया जाए.’

कब शुरू हुआ रोस्टर का विवाद?

रोस्टर का विवाद पहली बार 2006 में सामने आया था. उस समय केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण के तहत नियुक्तियों के सवाल के समाधान के लिए कांग्रेस के नेतृत्व वाली तत्कालीन यूपीए सरकार के डीओपीटी मंत्रलाय ने 2005 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को पत्र भेजकर यूनिवर्सिटी में आरक्षण लागू करने की खामियों को दूर करने का निर्देश दिया. तब यूजीसी के तत्कालीन चेयरमैन प्रोफेसर वीएन राजशेखरन पिल्लई ने प्रोफेसर रावसाहब काले की अध्यक्षता में आरक्षण को लेकर एक फॉर्मूला बनाने के लिए एक तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया था. इस कमेटी में कानूनविद प्रोफेसर जोश वर्गीज और यूजीसी के तत्कालीन सचिव डॉ. आर के चौहान शामिल थे.

प्रोफेसर काले कमेटी ने डीओपीटी मंत्रालय के 02 जुलाई 1997 के दिशानिर्देश को, जो कि उच्चतम न्यायालय के सब्बरवाल जजमेंट के आधार पर तैयार हुआ है, को आधार मानते हुए 200 प्वाइंट का रोस्टर बनाया. इसमें किसी विश्वविद्यालय के सभी विभाग में कार्यरत असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर का तीन स्तर पर कैडर बनाने की अनुशंसा की गई. कमेटी ने विभाग की बजाय विश्वविद्यालय, कॉलेज को यूनिट मानकर आरक्षण लागू करने की सिफारिश की, क्योंकि उक्त पदों पर नियुक्तियां विश्वविद्यालय करता है, न कि उसका विभाग.

इसी 200 प्वाइंट रोस्टर को बीएचयू के छात्र विवेकानंद तिवारी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में में चुनौती दी. हाईकोर्ट ने 200 प्वाइंट की बजाय 13 प्वाइंट रोस्टर को विश्वविद्यालयों में लागू करने का फैसला सुनाया था. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि आरक्षण विभाग को ईकाई मानकर दिया जाए. इसके लिए 13 प्वाइंट का रोस्टर बना. इसके तहत चौथा पद ओबीसी को, सातवां पद अनुसूचित जाति को, आठवां पद ओबीसी के लिए निर्धारित है. 14वां पद अगर विभाग में आता है, तभी वह अनुसूचित जनजाति को मिलेगा. इनके अलावा सभी पद अनारक्षित घोषित कर दिए गए. अगर 13 प्वाइंट के रोस्टर के तहत आरक्षण को लागू कर भी दिया जाए तो भी असल आरक्षण 30% के आसपास ही रह जाएगा, लेकिन फिलहाल केंद्र सरकार की नौकरियों में एससी-एसटी-ओबीसी के लिए 49.5 फीसदी आरक्षण का प्रावधान है. 

Friday, December 28, 2018

पति-पत्नी बनकर साथ रहती थीं दो लड़कियां, कमरे में मिली लाश

झारखंड के जमशेदपुर जिले में बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है. जहां दो समलैंगिक लड़कियों की संदिग्ध मौत हो गई. उन दोनों के शव एक कमरे में फांसी पर झूलते हुए मिले. बताया जा रहा है कि वे दोनों लड़कियां पति-पत्नी की तरह रहती थीं. एक लड़की की उम्र 21 साल थी. वो पैंट-शर्ट पहना करती थी. जबकि दूसरी लड़की नाबालिग थी.

यह घटना गम्हरिया के जगन्नाथपुर रोड नंबर 8 की है. जहां ओडिशा में मयूरभंज जिले के बारीपदा की निवासी दो लड़कियां अनुज कुमार के घर में किराए पर रहती थीं. दोनों लड़कियों के परिवारों के बीच अच्छे संबंध हैं. लिहाजा दोनों एक साथ रहा करती थी. घटना से एक दिन पहले उन दोनों ने अपने घरवालों से कहा कि वो दोनों हमेशा के लिए एक साथ रहना चाहती है.

उनकी बात सुनकर घरवालों के होश उड़ गए. दोनों के घरवालों ने उन्हें वापस घर लौट आने के लिए कह दिया. इसके बाद उनकी लड़कियों से कोई बात नहीं हुई. जब दोनों ने फोन भी नहीं उठाए तो घरवालों को चिंता होने लगी. दोनों के परिजन ओडिशा से जमशेदपुर आ गए.

इसके बाद वे सभी गम्हरिया के जगन्नाथपुर रोड नंबर 8 पर मौजूद अनुज के मकान पर पहुंचे, जहां दोनों लड़कियां किराए के कमरे में रहती थी. जब वे लोग लड़कियों के कमरे में पहुंचे तो सामने का मंजर देखकर उनके होश फाख्ता हो गए. दरअसल, दोनों की लाशें कमरे में फांसी के फंदे पर लटकी हुई थी.

फौरन इस बात की सूचना पुलिस को दी गई. पुलिस मौके पर पहुंची और कमरे की तलाशी भी ली. लेकिन वहां से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला. इसके बाद दोनों नीचे उतार कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिए गए. अब पुलिस इस मामले में छानबीन कर रही है.

रिपोर्ट के मुताबिक इस योजना की घोषणा 2019-20 के अंतरिम बजट में या फिर शीत सत्र के समापन के बाद की जा सकती है. इसके अलावा पहले चरण में लघु और सीमांत किसान को शामिल किया जा सकता है. बता दें कि देश भर में करीब 9 से 11 करोड़ लघु एवं सीमांत किसान हैं. इससे पहले तेलंगाना की तर्ज पर ओडिशा और झारखंड की सरकारों ने भी रैयत बंधु जैसी योजना लागू करने का एलान कर चुकी हैं.

इन विकल्‍पों पर भी हो रहा विचार!

इसके अलावा भी किसानों को राहत देने के लिए कई विकल्‍पों पर मंथन जारी है. रिपोर्ट के मुताबिक मोदी सरकार के विभिन्‍न मंत्रालयों और अधिकारियों के बीच छोटे और सीमांत किसानों को मुफ्त में फसल बीमा देने और उधारी योजनाओं में कुछ फेरबदल करने पर भी चर्चा हुई है. बता दें कि वर्तमान में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसानों से अलग-अगल फसलों के लिए 2 से 5 फीसदी तक की दर से प्रीमियम वसूला जाता है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि किसानों को आय मुहैया कराने की योजना पर सरकारी खजाने पर शुरुआती दौर में करीब 600 से 700 अरब रुपये का बोझ आने का अनुमान है. इस योजना में आने वाली कुल खर्च में केंद्र और राज्यों की हिस्सेदारी कितनी होगी, इस पर विचार हो रहा है.

Wednesday, December 19, 2018

अयोध्या में बनेगा एयरपोर्ट, योगी सरकार ने किया 8 हजार करोड़ का अनुपूरक बजट पेश

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने बुधवार ने 8 लाख 54 हजार करोड़ रुपए का दूसरा अनुपूरक बजट पेश किया. वित्त मंत्री राजेश अग्रवाल ने बजट को प्रदेश के अंतिम पायदान पर बैठे व्यक्ति के लिए बताया. इस बार के बजट में सड़क और स्वास्थ्य योजना से लेकर अयोध्या में एअरपोर्ट निर्माण के लिए खास तवज्जो दी है.

राजेश अग्रवाल ने विधानसभा में बजट पेश करते हुए कहा कि 4 लाख 28 हजार करोड़ का पहले हमने बजट दिया था. इसके पहला अनुपूरक बजट 45 हजार करोड़ रुपये का था. अब इस कड़ी में दूसरा अनुपूरक बजट 8 लाख 54 हजार करोड़ रुपये का है.

उन्होंने कहा कि हमारी सरकार और तमाम विभागों ने 30 नवंबर तक एक बड़ी राशि खर्च कर ली है. इस दौरान प्रदेश सरकार ने अच्छा खासा राजस्व भी अर्जित किया है. इस बार प्रदेश में खनन और आबकारी सहित कई विभागों से बड़ा राजस्व प्राप्त हुआ है.

वित्त मंत्री ने कहा, ' हमने मंडी समिति के लिए भी बड़े काम किए हैं. मंडी समिति से 218 करोड़ की अतरिक्त आय अर्जित की गई है.' स्वच्छ भारत मिशन से लेकर मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के लिए बजट में खास ध्यान रखा गया है.

अग्रवाल ने कहा कि स्वास्थ्य सुविधा के लिए भी बजट में जगह दी गई है. सूबे में करीब 6 करोड़ लोग आयुष्मान भारत योजना से लाभान्वित होंगे. उन्होंने कहा कि प्रदेश के अंदर उड़ान योजना के तहत काम हो रहा है. सूबे में 9 एयरपोर्ट पर काम चल रहा है. जेवर एयरपोर्ट लिए भी बजट में व्यवस्था की गई है.

योगी सरकार ने अनुपूरक बजट में अयोध्या में बनने वाले एयरपोर्ट के लिए बजट में व्यवस्था की गई है. बता दें कि मुख्यमंत्री ने दीपावली पर्व के मौके पर आयोजित दीपोत्सव में अयोध्या में भगवान श्रीराम के नाम पर एयरपोर्ट की स्थापना का एलान किया था.

वित्त मंत्री ने कहा कि सूबे में अभी तक 13 मेडिकल कॉलेज है. हमारी सरकार ने प्रदेश में 15 सरकारी मेडिकल कॉलेज बनाने का काम कर रही है. वारणसी में कैंसर इंस्टीटूट बनाने का काम चल रहा है.

मोदी सरकार के बीच वे विवाद जिनसे तय थी उर्जित पटेल की विदाई

ऐसा ही मामला देश की इस पार्टी के अंदर भी साफ दिखाई दे रहा है. पार्टी का संविधान पृष्ठ 13 पर कहता है कि पार्टी अध्यक्ष राष्ट्रीय कार्यकारिणी के 120 सदस्यों में से अधिक से अधिक 13 उपाध्यक्ष, 9 महामंत्री, एक महामंत्री(संगठन), अधिक से अधिक 15 मंत्री तथा एक कोषाध्यक्ष को मनोनीत करेगा. मनोनीत किए जाने वाले इन पदाधिकारियों पर पार्टी के कामकाज की अलग-अलग जिम्मेदारी होगी. संविधान में किए गए इस प्रावधान के विपरीत इस पार्टी में बीते 30 महीनों से कोषाध्यक्ष का पद खाली पड़ा है. लेकिन पार्टी अध्यक्ष अमित शाह इस पद पर राष्ट्रीय कार्यकारिणी के किसी सदस्य को मनोनीत नहीं कर पा रहे हैं.

दरअसल भारतीय जनता पार्टी के कोषाध्यक्ष का पद 16 जनवरी 2016 को तब रिक्त हो गया जब तत्कालीन कोषाध्यक्ष पियूष गोयल को केन्द्रीय कैबिनेट में जगह दे दी गई. गोयल को स्वतंत्र प्रभार के साथ खनन मंत्रालय दिया गया. इसके बाद सितंबर 2017 में रेल मंत्रालय से सुरेश प्रभु की छुट्टी के बाद गोयल को रेलवे का प्रभार दिया गया. इसके बाद एक बार फिर हाल ही में वित्त मंत्री अरुण जेटली की खराब तबीयत के चलते वित्त मंत्रालय का भी प्रभार दिया गया.

Friday, November 23, 2018

राजनयिकों से बदसलूकी पर भारत ने पाक से जताया विरोध, गुरुद्वारों में जाने से रोका गया था

सिख श्रद्धालुओं की आस्था के अहम स्थलों में से एक करतारपुर साहिब के लिए भारत और पाकिस्तान ने कॉरिडोर बनाने का एलान किया है, लेकिन पाकिस्तान फिर भी अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आ रहा. सिख श्रद्धालुओं के पाकिस्तान स्थित करतारपुर साहिब आसानी से और बिना किसी अड़चन आने जाने के लिए कॉरिडोर बनाने का एलान किया गया. लेकिन बुधवार शाम को ही पाकिस्तान ने भारतीय राजनयिकों को ननकाना साहिब गुरुद्वारा में प्रवेश करने से रोक दिया. इसी तरह राजनयिकों को गुरुवार सुबह सच्चा सौदा गुरुद्वारा में जाने से रोका गया. 

भारत ने इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग के अधिकारियों को कथित तौर पर परेशान करने और पाकिस्तान में भारतीय सिख श्रद्धालुओं को यात्रा की अनुमति से इंकार करने पर शुक्रवार को पाकिस्तान के समक्ष विरोध दर्ज कराया.

विदेश मंत्रालय के मुताबिक भारतीय उच्चायोग के राजनयिक अधिकारियों को परेशान किया गया और उन्हें 21 एवं 22 नवंबर को गुरुद्वारा ननकाना साहब और गुरुद्वारा सच्चा सौदा में भारतीय श्रद्धालुओं से मिलने की अनुमति नहीं दी गई.

मंत्रालय के बयान में कहा गया है कि पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय से पूर्व में यात्रा अनुमति मिलने के बावजूद उन्हें वहां जाने नहीं दिया गया.

बता दें कि अतीत में ऐसे अवसरों पर पाकिस्तानी सुरक्षा अधिकारी की ओर से भारतीय राजनयिकों का मामला देखा जाता था. लेकिन इस बार खालिस्तान समर्थक गोपाल सिंह चावला की देखरेख में सब हो रहा था. चावला को कुख्यात आतंकी हाफिज़ सईद का करीबी माना जाता है.  

गुरुवार सुबह भारतीय उच्चायोग से जुड़े दो अधिकारी रंजीत सिंह और सुनील कुमार गुरुद्वारा सच्चा सौदा पहुंचे. दोनों अधिकारियों ने गुरुद्वारे में प्रवेश भी किया. लेकिन जैसे ही चावला और उसके गुर्गे गुरुद्वारे पहुंचे, दोनों भारतीय राजनयिकों को अपमानजनक ढंग से गुरुद्वारा परिसर से बाहर जाने के लिए मजबूर किया गया. 

पाकिस्तान ने सिख पवित्र स्थलों में भारतीय राजनयिकों को प्रवेश नहीं दिए जाने के पीछे सुरक्षा कारणों का हवाला दिया है. इन राजनयिकों को भारतीय सिख श्रद्धालुओं से मिलने का मौका भी नहीं दिया जाता.

भारत ने उन खबरों पर गहरी चिंता व्यक्त की है जिनमें भारतीय तीर्थयात्रियों की पाकिस्तान यात्रा के दौरान साम्प्रदायिक वैमनस्य और असहिष्णुता को उकसाने और पृथकतावाद को बढ़ावा देने जैसी बातें सामने आई हैं. इंडिया टुडे की पहुंच में ऐसी तस्वीरें और वीडियो हैं जिनमें पाकिस्तान के गुरुद्वारों के आसपास खालिस्तान समर्थक पोस्टर और बैनरों को लगे देखा जा सकता है. बता दें कि गुरु नानक देव जी की 550वीं जयंती पर भारत से 3800 सिख श्रद्दालुओं को पाकिस्तान स्थित गुरुद्वारों में जाने के लिए पाकिस्तान सरकार ने अनुमति दी है.

Monday, November 12, 2018

मोदी सरकार ने SC में बताया- क्यों और कैसे खरीदा राफेल

राफेल विमान डील पर छिड़े विवाद ने अभी भी राजनीतिक तूल पकड़ा हुआ है. राजनीति के अलावा इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई जारी है. सोमवार को केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में राफेल डील से जुड़े सभी दस्तावेज सौंपे.

केन्द्र सरकार ने 36 राफेल विमानों की खरीद के संबंध जो भी फैसले लिए गए हैं, उन सभी की जानकारी याचिकाकर्ता को सौंप दी है. राफेल विवाद से जुड़ी याचिका वरिष्ठ वकील एमएल शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की थी. केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कुल 9 पेज के दस्तावेज सौंपे हैं, जिनमें इस डील का पूरा इतिहास, प्रक्रिया को समझाया गया है.

सरकार ने दस्तावेजों में कहा है कि उन्होंने राफेल विमान रक्षा खरीद प्रक्रिया-2013 के तहत इस खरीद को अंजाम दिया है. विमान के लिये रक्षा खरीद परिषद की मंजूरी ली गई थी, भारतीय दल ने फ्रांसीसी पक्ष के साथ बातचीत की.

दस्तावेजों में कहा गया कि फ्रांसीसी पक्ष के साथ बातचीत तकरीबन एक साल चली और समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले मंत्रिमंडल की सुरक्षा मामलों की समिति की मंजूरी ली गई.

केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बताया है कि राफेल पर भारतीय ऑफसेट पार्टनर चुनने में उनकी कोई भूमिका नहीं थी. ये पूरी तरह से ऑरिजनल इक्विपमेंट मैनुफैक्चरर ( OEM) यानी डेसाल्ट एविएशन का फैसला था. दस्तावेज में बताया गया है कि आफसेट पार्टनर का चुनाव दो निजी कंपनियों का फैसला था, इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं थी.

आपको बता दें कि अपनी याचिका में याचिकाकर्ता के द्वारा अपील की गई थी कि केंद्र सरकार को राफेल विमान के दाम सार्वजनिक करने चाहिए.

देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस इस मामले में सरकार पर अनियमितता बरतने का आरोप लगाती रही है. हालांकि, सरकार का पक्ष रहा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर राफेल विमान की कीमतों का खुलासा नहीं किया जा सकता है.

अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन का विवाद अभी भी कोर्ट में चल रहा है. सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को इस मामले की तेजी से सुनवाई करने के लिए अपील की गई थी. ये अपील अखिल भारतीय हिंदू महासभा ने दाखिल की थी. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने इस मामले की सुनवाई जल्द करने से इनकार कर दिया है.

चीफ जस्टिस का कहना है कि उन्होंने पहले ही इस मामले में तारीख दी हुई है. गौरतलब है कि इस मुद्दे पर इससे पहले 29 अक्टूबर को सुनवाई हुई थी. इस सुनवाई में चीफ जस्टिस ने सुनवाई टाल दी थी और जनवरी, 2019 की तारीख दी थी. सुप्रीम कोर्ट द्वारा मामले की सुनवाई को आगे बढ़ाने से संत समाज में काफी रोष पैदा हुआ था.

आपको बता दें कि इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रंजन गोगोई समेत जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस के. एम जोसफ की पीठ कर रही है.

क्या था इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला?

हाई कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने 30 सितंबर, 2010 को 2:1 के बहुमत वाले फैसले में कहा था कि 2.77 एकड़ जमीन को तीनों पक्षों- सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला में बराबर-बराबर बांट दिया जाए. इस फैसले को किसी भी पक्ष ने नहीं माना और उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. सुप्रीम कोर्ट ने 9 मई 2011 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले पर रोक लगा दी थी.

इलाहाबाद हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट में ये केस बीते 8 साल से है. 2019 के आम चुनावसे पहले इस मसले ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है.